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मेरी कवितायें

खामोशीयाँ

March 1, 2007

कहे भी थे जो शब्द कभी
गुम हो गये है कँही
रहता हूँ आजकल मैं
अपनी खामोशीयों के साथ

सम्भल के चलना सीख गया हूँ,
जानता हूँ
लड़खड़ाते कदमो को सहारा देने
नही है अब वो हाथ

थी सुबह भी, दोपहर भी
और शाम भी वहाँ
चुनी है मैने ही
अपनी खुशी से वीरानी रात

क्या जानता था मैं,
गहरे होते इस अन्धेरे सी
गहराती बेदर्द टीस करेगी
लहुलुहान युँ मेरे जज्बात

इतना अन्धेरा, इतनी तनहाई,
फिर भी खुश हूँ मैं
छुपाये खुद में भीतर कँही
खुशनुमा यादो के लम्हात

होती है हर रात की एक सुबह,
अन्धेरे के बाद रौशनी
छोड़ जाये शायद कभी,
है मेरी हमसफ़र आज जो रात

रहता हूँ आजकल मैं
अपनी खामोशीयों के साथ

Tags: hindi, kavita, khamoshiyaan, poetry, sandeep


Posted at: 03:25 PM | 0 Comments | Add Comment | Permalink

मेरी ये आँखे

January 31, 2007

तेरी सुरत जो मैं ना देखु
तो कैसे काटु अंधेरी राते
कि जिनमे तेरी ही रोशनी हो
कहाँ से लाऊँ मैं ऐसी आँखे

दिलो की बाते दिलो के अंदर
जरा सी जिद से दबी हुइ है
वो सुनना चाहे जुबाँ से सबकुछ
समझे नही क्या कहती है आँखे

तेरी ही साँसे, तेरा ही जादु
तेरी ही हस्ती, तेरी हि खुशबु
तेरे ही रुप की एक् झलक को
बेचैन रहती है मेरी ये आँखे


Posted at: 04:19 PM | 0 Comments | Add Comment | Permalink

प्रतिक्षा

January 30, 2007

प्रतिक्षा है मुझे उस क्षण की
जब भावनाये शिथिल पड़ जायेंगी
और विचार ठहर जायेंगे
मधम पड़ती नब्ज़ो में जब
जीवन ध्वनि अवचेतन होगी
बोझिल होती पलके मेरी
अन्तत्ह जब बन्द हो जायेंगी
और फिर उन बन्द हो चुकि
पलको के सम्मुख तुम होगी,
दिव्य प्रकाश की तरह चमचमाती
साँस थम चुकि होगी एक नाम पर
वही नाम जो है तुम्हारी पहचान
उस छण, तुम्हारे निराकर
रूप में वीलीन हो जाउँगा मैं
फिर ना होगी मिलन कि उमंग,
ना होगी बिछोह कि पीड़ा
ना जन्म कि हलचल
ना म्रित्यु का सन्नाटा
ना मैं ना तुम....सिर्फ़ हम
असीम, अतुल्य, अलॉकिक
जैसे यह ब्रह्मँन्ड

Tags: hindi, kavita, poetry, pratiksha, sandeep


Posted at: 06:31 PM | 0 Comments | Add Comment | Permalink

हर रंग में

January 27, 2007

चाहतो के हर रंग में
समा गयी है बस यही एक चाह
तेरी ज़ुल्फ़ो के रेश्मी साये में
मिले हर एक पहर को पनाह

आँखो की वो गहरी खामोशी
साँसो की वो सन्दली कशिश
खींच ले अपनी ही तरफ़
मुझसे गुजरती हर एक राह

ख्यालो के हर मुकाम पर
लिखा हो बस तेरा ही नाम
बाँहो की हदो में तेरी मौजुदगी
की बने यह वादियाँ गवाह

गुनगुनाते हुए तेरा ही तरन्नुम
कट जाये युँ ही ये सफ़र
बन जाओ मेरी जिन्दगी तुम
गर मेरी जिन्दगी की हमराह


Posted at: 04:17 PM | 0 Comments | Add Comment | Permalink

फ़साना

January 26, 2007

ना हम है ना तुम हो, ना बन्दिशे जहाँ की
महज जिन्दगी क तराना बचा है

हमारी हकीकत जमाने से पूछो
नही याद आता क्या छुपाना बचा है

जहाँ सन्जोये थे सपने सुबह के
वहाँ रात का एक पैमाना बचा है

मिटा तो चुका हूँ जिन्दगी के अन्धेरे
ना जाने ये कैसा फ़साना बचा है

ये कैसी खामोशी में डुबा शहर है
शायद ही यहाँ कोइ दीवाना बचा है
Posted at: 04:14 PM | 0 Comments | Add Comment | Permalink

तेरी मौजुदगी

January 25, 2007

अंधेरी रातो में भी मेरा साया पास है
तुम जो साथ हो तो हर चीज़ खास है
तेरी मौजुदगी खीँचती है मुस्कुराहटे मेरी तरफ़
गम जैसी कोई चीज़ नही आस पास है
पहले तो तन्हा लम्हो में बसती थी सदीयाँ
तेरे साथ सदीयाँ भी लम्हो का वास है
मासुम चेहरा और ये भोली अदायेँ
मेरी उमन्गो को देती नयी साँस है
बस जाओ मेरी पनाहो में तुम
हाँ, यही तो जिन्दगी की आखिरी प्यास है
अंधेरी रातो में भी मेरा साया पास है
तुम जो साथ हो तो हर चीज़ खास है

Tags: hindi, kavita, maujudgi, poetry, sandeep, teri


Posted at: 04:07 PM | 0 Comments | Add Comment | Permalink

तुम्हारे नयनो का सागर

January 8, 2007

इस दोपहर के सुने विचारो में

लहराता है आज भी वह प्रेम का सागर

जो ठहरा है तुम्हारे नयनो के बान्ध में



उन जलते छणो में मेर एकाकीपन,

और घना होके जल उठता है



सोचता हूँ.....

वही सागर जिसके गहराई में डुबकर

कभी पाई थी मैने अथाह शीतलता

क्युं आज है इतना लाल दहकता सा

कि उसकी कल्पना भी झुलसा देती है मुझे



अलसाई सी इस दोपहरी में जलता मेरा मन

फिर भी ढुँढता है वही शीतलता

फेकता है फिर विचारो के पतवार उस सागर में

जो ठहरा है तुम्हारे नयनो के बान्ध में



डूबना चाहता हूँ झुलसते इस समन्दर में

शायद इसलिये क्युन्कि जानता हूँ मैं

कही गहरायी में मैं आज भी पा सकुँगा

वही शीतलता जो मेरे जीवन कि धुरी है



लेकिन आखिर है तो यह केवल एक कल्पना

और कल्पनाओ का क्या...कुछ भी सोच सकती है

Tags: hindi, kavita, nayno, poetry, saagar, sandeep, tumhare


Posted at: 03:41 PM | 0 Comments | Add Comment | Permalink

फिर भी कुछ कमी सी है

December 20, 2006

युँ तो बहुत कुछ है पास मेरे फिर भी कुछ कमी सी है

घिंरा हूँ चारो तरफ़ मुस्कुराते चेहरो से

फिर भी जिन्दगी में उजाले भरने वाली उस मुस्कुराहट की कमी सी है

दिख रही है पहचान अपनी ओर उठते हर नज़र में

फिर भी दिल को छु लेने वालि उस निगाह की कमी सी है

गुँज़ता है हर दिन नये किस्सो, कोलाहल और ठहाको से

फिर भी कानो में गुनगुनाति उस खामोशी कि कमी सी है

बढ़ रहे है कदम मेरे पाने को नयी मन्ज़िलें

फिर भी इन हाथो से छुट चुके उन नरम हाथो की कमी सी है

Tags: hindi, kami, kavita, kuch, poetry, sandeep


Posted at: 12:40 PM | 0 Comments | Add Comment | Permalink

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